John Shaqi

अबू अफ़क: 120 साल के बूढ़े शायर का क़त्ल — और वह रिवायत जिसकी कोई सनद नहीं

इब्न सअद की तबक़ात में बूढ़े शायर अबू अफ़क के रात के क़त्ल की रिवायत मिलती है — मगर बुख़ारी और मुस्लिम में इसका नाम तक नहीं। सवाल सिर्फ़ एक है: क्या इस रिपोर्ट की कोई सनद है भी? दोनों कॉलम असल पाठों के साथ — फ़ैसला आपका।

By John Shaqi · July 23, 2026 · 15 min read

अबू अफ़क: 120 साल के बूढ़े शायर का क़त्ल — और वह रिवायत जिसकी कोई सनद नहीं

एक बूढ़ा आदमी, एक गर्म रात, एक तलवार

मदीना की एक गर्म गर्मियों की रात है, हिजरत का दूसरा साल। एक बूढ़ा आदमी — किताबें कहती हैं कि उसकी उम्र एक सौ बीस बरस हो चुकी थी — अपने घर के बाहर आँगन में सो रहा है, जैसे उस गर्म मुल्क में बूढ़े लोग सोया करते थे। वह बनू अम्र बिन औफ़ का आदमी है, और शायर है। उसका हथियार सारी ज़िंदगी सिर्फ़ शब्द रहे। अँधेरे में एक शख़्स आता है, सोते हुए बूढ़े के जिगर पर तलवार रखता है, और उस पर अपना वज़न डाल देता है, यहाँ तक कि तलवार बिस्तर तक उतर जाती है। बूढ़ा एक चीख़ मारता है। सुबह तक वह मर चुका है।

उसका नाम अबू अफ़क था। और बारह सदियों से बहस इस बात पर नहीं कि यह क़िस्सा भयावह है या नहीं — बहस उससे कहीं सूखे और कहीं अहम सवाल पर है: क्या इस रिवायत की सिरे से कोई सनद भी है?

Continue Reading

Continue reading this article

Sign in free to read in full. Become a member to join the discussion without limits.

Sign in free to read →
Reader$0/mo
  • Read every article
  • Comment and reply (up to 100 words, 10/month)
  • Browse the community
  • Reader badge
Join as Reader
Scholar$8/mo
  • Everything in Writer
  • Scholar badge
  • Featured in the community
Join as Scholar