क्या बिस्मिल्लाह आयत है? चार मज़हबी मकतब, एक सवाल
क्या बिस्मिल्लाह इर-रहमान इर-रहीम सूरह फ़ातिहा की आयत है या नहीं? शाफ़ई कहते हैं हाँ — बुलंद आवाज़ से; हनफ़ी कहते हैं नहीं — आहिस्ता; मालिकी फ़र्ज़ नमाज़ में पढ़ते ही नहीं। चारों मज़हबों की किताबें और हदीसें, दोनों कॉलम, जैसी हैं वैसी। फ़ैसला आपका।
By John Shaqi · July 21, 2026 · 15 min read
एक गली, तीन मस्जिदें
दुनिया के लगभग हर बड़े मुसलमान शहर में ऐसी एक गली मौजूद है। एक तरफ़ वह मस्जिद है जिसका इमाम शाफ़ई मज़हब पर अमल करता है। मग़रिब की नमाज़ में वह बुलंद आवाज़ से पढ़ता है: "बिस्मिल्लाह इर-रहमान इर-रहीम" — ऊँची, साफ़, मुक़्तदियों के कानों में पड़ने वाले सबसे पहले शब्द — और उसके बाद "अल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन"। ठीक सड़क के पार हनफ़ी मस्जिद है। इमाम "अल्लाहु अकबर" कहता है, फिर एक पल की ख़ामोशी — वह बिस्मिल्लाह पढ़ रहा है, मगर आहिस्ता, अपने दिल में — और मुक़्तदियों को क़िरात "अल्हम्दुलिल्लाह" से शुरू होती सुनाई देती है। और फ़ेज़ या नुआकशॉट में, उत्तरी और पश्चिमी अफ़्रीक़ा के किसी भी मालिकी शहर में, तीसरा इमाम फ़र्ज़ नमाज़ सीधी "अल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन" से शुरू करता है — उससे पहले कुछ भी नहीं। न बुलंद आवाज़ से बिस्मिल्लाह, न आहिस्ता।
तीन इमाम। तीन तरीक़े। और हर एक के पीछे सदियों का इल्मी ज़ख़ीरा, जो इसरार करता है कि यही — बिल्कुल यही — नबी (सल्ल.) की नमाज़ का तरीक़ा है।
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