ग़दीर ख़ुम — "जिसका मैं मौला, उसका अली मौला" (तिर्मिज़ी 3713)
मक्का और मदीना के बीच एक तालाब पर पैग़म्बर (सल्ल.) ने अली (रज़ि.) का हाथ उठाकर एक छोटा-सा वाक्य कहा। तिर्मिज़ी 3713 ने उसे सुरक्षित रखा — और इस्लाम की दो सबसे बड़ी जमाअतें चौदह सदियों से उसे दो विपरीत तरीक़ों से पढ़ रही हैं। दोनों पाठों के स्रोत, आमने-सामने।
By John Shaqi · July 22, 2026 · 15 min read

दो शहरों के बीच एक पड़ाव
18 ज़िल-हिज्जा, सन 10 हिजरी — ईसवी हिसाब से मार्च 632। पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने जीवन के एकमात्र हज — हज्जतुल विदा — से लौट रहे हैं। दसियों हज़ार हाजी साथ चल रहे हैं। रास्ते के लगभग बीच में, जुहफ़ा नामक स्थान के पास — जहाँ से मदीना, मिस्र, शाम और इराक़ के क़ाफ़िले अलग-अलग राह लेते थे — पानी का एक तालाब है जिसे ग़दीर ख़ुम यानी "ख़ुम का तालाब" कहा जाता है। दोपहर की गर्मी में आदेश मिलता है: रुक जाओ। जो आगे निकल चुके थे उन्हें वापस बुलाया जाता है, जो पीछे रह गए थे उनका इंतज़ार होता है। कजावों से एक ऊँची जगह बनाई जाती है। पैग़म्बर (सल्ल.) अपने चचेरे भाई और दामाद अली बिन अबी तालिब (रज़ि.) का हाथ थामकर ऊपर उठाते हैं ताकि सब देख लें, और एक छोटा-सा वाक्य कहते हैं।
चौदह सदियाँ बीत गईं, और वही एक वाक्य इस्लाम की दो सबसे बड़ी जमाअतों के बीच ठीक विभाजन-रेखा पर खड़ा है। एक जमाअत इस दिन को अपनी सबसे बड़ी ईदों में गिनती है और इस वाक्य में अली (रज़ि.) के उत्तराधिकार की घोषणा पढ़ती है। दूसरी जमाअत भी यही वाक्य रिवायत करती है, जिस हस्ती की शान में है उनसे मुहब्बत रखती है — मगर इसमें कोई नियुक्ति नहीं पढ़ती। शब्द एक। पाठ दो। इतिहास दो।
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