इब्न अल-जौज़ी की अल-मौज़ूआत: जब सहीह मुस्लिम की हदीस जाली रिवायतों की किताब में जा पहुँची
इब्न अल-जौज़ी ने गढ़ी हुई हदीसों के ख़िलाफ़ किताब अल-मौज़ूआत लिखी — मगर उसमें सहीह मुस्लिम की एक हदीस और मुसनद अहमद की अड़तीस सनदें भी आ गईं। इब्न हजर ने बचाव लिखा, सुयूती ने अल-लआली अल-मस्नूआ में हर मुक़दमा दोबारा खोला, और एक हदीस ने सहीह से मौज़ू तक हर दर्जा समेट लिया। दोनों तरफ़ के पाठ, ज्यों के त्यों।
By John Shaqi · July 23, 2026 · 15 min read

सहीह मुस्लिम की हदीस, जाली रिवायतों के खाते में
बग़दाद, छठी सदी हिजरी के आख़िरी बरस। अबुल-फ़रज इब्न अल-जौज़ी — हंबली फ़क़ीह, इतिहासकार, मुफ़स्सिर और अब्बासी बग़दाद के सबसे मशहूर वाइज़ — एक ऐसी किताब तैयार कर रहे हैं जिसका घोषित मक़सद सुन्नत की हिफ़ाज़त है: "किताब अल-मौज़ूआत", यानी गढ़ी हुई हदीसों की किताब। रिवायत पर रिवायत पेश होती है, सनद परखी जाती है, और मुहर लगती है: मौज़ू — जाली। काम पूरा हुआ तो प्रचलित छपे संस्करण के अनुसार लगभग अठारह सौ पचास रिवायतें इस किताब में दर्ज थीं।
और इन्हीं में एक रिवायत वह भी थी जिसे लगभग तीन सदियाँ पहले इमाम मुस्लिम ने अपनी उस किताब में जगह दी थी जिसे उम्मत "अल-सहीह" कहती आई है — सहीह मुस्लिम।
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