आइशा (र.अ.) की तसहीहात
एक शास्त्रीय विद्वान ने वे तमाम मामले इकट्ठा किए जहाँ आइशा (र.अ.) ने दूसरे सहाबा की रिवायतों की तसहीह की, उन पर इस्तिदराक किया या उनसे मतभेद किया। यह लेख उसी किताब को खोलता है — सहाबी की रिवायत के साथ आइशा (र.अ.) का जवाब, दोनों कॉलम, और फ़ैसला आप पर।
By John Shaqi · July 22, 2026 · 15 min read

जब उम्मुल-मोमिनीन ने सहाबा की तसहीह की
इस्लाम की पहली नस्ल में नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कथनों और कर्मों की रिवायतें स्मृति से स्मृति तक पहुँचती रहीं। सहाबा जो सुनते, उसे बयान करते; दूसरे उसे स्वीकार कर के आगे पहुँचाते। लेकिन हर रिवायत बिना जाँच के स्वीकार नहीं हुई। कई अवसरों पर ख़ुद नबी-ए-करीम के घर की एक आवाज़ ने किसी रिवायत का जायज़ा लिया, उसे क़ुरआन की कसौटी पर और उस चीज़ के सामने रखा जिसकी वह स्वयं गवाह थीं, और कहा कि हक़ीक़त इस तरह नहीं थी।
यह आवाज़ आइशा बिन्त अबी बक्र (र.अ.) की थी, नबी-ए-करीम की पत्नी, जिन्हें मुसलमान उम्मुल-मोमिनीन कहते हैं। लगभग ढाई सदी बाद एक विद्वान वे तमाम मामले इकट्ठा करने बैठे जहाँ उन्होंने दूसरे सहाबा की रिवायतों की तसहीह की, उन पर इस्तिदराक किया या उनसे मतभेद किया, और उन्हें एक किताब की शक्ल दी।
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