John Shaqi

आयत-ए-वसीयत का नस्ख़ — क़ुरआन ने वसीयत का हुक्म दिया, और किताबें कहती हैं हुक्म उठा लिया गया

क़ुरआन माता-पिता और क़रीबी रिश्तेदारों के लिए वसीयत का हुक्म फ़र्ज़ की ज़बान में देता है — मगर क्लासिकी किताबें इस आयत को "मन्सूख़" लिखती हैं। किसी दूसरी आयत से, या एक ख़बर-ए-वाहिद हदीस से? उसूल-ए-फ़िक़्ह का एक क़दीमतरीन इख़्तिलाफ़।

By John Shaqi · July 21, 2026 · 15 min read

क़ुरआन ने वसीयत का हुक्म दिया — और रिवायत कहती है कि हुक्म उठा लिया गया

क़ुरआन की दूसरी सूरत में एक आयत है जो एक सरीह (स्पष्ट) हुक्म की तरह पढ़ी जाती है। मौत क़रीब आती है; इनसान माल छोड़ कर जा रहा है; और मतन (पाठ) कहता है कि वसीयत करनी चाहिए — माता-पिता के लिए, क़रीबी रिश्तेदारों के लिए, भलाई के साथ। यह फ़र्ज़ के अंदाज़ में कहा गया है। और फिर भी, तक़रीबन कोई भी क्लासिकी तफ़्सीर खोलिए, और इस आयत के पहलू में आपको एक भारी लफ़्ज़ मिलेगा: मन्सूख़ — यानी उठा लिया गया, अब नाफ़िज़ (लागू) नहीं रहा।

अल्लाह की किताब का एक हुक्म उन्हीं उलमा की क़लम से, जो इस किताब की ताज़ीम करते थे, "ग़ैर-नाफ़िज़" कैसे क़रार पाया? इसकी जगह क्या आया? और किस दलील पर — किसी दूसरी आयत पर, या नबी-ए-करीम (सल्ल.) के किसी फ़रमान पर? यह इस्लामी उसूल-ए-फ़िक़्ह के क़दीमतरीन और सबक़-आमोज़ इख़्तिलाफ़ात में से एक है, और इसकी बुनियाद एक ऐसे सवाल पर है जो वसीयत और विरासत से कहीं आगे जाता है: आख़िर किस चीज़ को यह इजाज़त है कि वह क़ुरआन की किसी आयत को मन्सूख़ कर दे?

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