John Shaqi

अज़ाब-ए-क़बर का मसला: हदीस का ज़ख़ीरा और क़ुरआन की ख़ामोशी

हदीस का एक वसीअ ज़ख़ीरा अज़ाब-ए-क़बर बयान करता है — फ़रिश्तों का सवाल, क़बर का भींचना, सुबह-ओ-शाम जन्नत या जहन्नम की झलक — जबकि क़ुरआन इसका नाम कभी नहीं लेता। दोनों कॉलम ज्यों के त्यों।

By John Shaqi · July 22, 2026 · 15 min read

अज़ाब-ए-क़बर का मसला: हदीस का ज़ख़ीरा और क़ुरआन की ख़ामोशी

दो क़बरें और खजूर की एक शाख़

मशहूर रिवायत है कि नबी मुहम्मद (सल्ल.) एक बार दो क़बरों के पास से गुज़रे और रुक गए। साथ मौजूद लोगों को कोई ग़ैर-मामूली बात नज़र न आई — मिट्टी के दो ढेर, बाक़ी क़बरों जैसे। मगर आपने फ़रमाया कि इन दोनों क़बर वालों को इस वक़्त अज़ाब दिया जा रहा है। किसी बहुत बड़े गुनाह पर नहीं, बल्कि दो मामूली कोताहियों पर: एक पेशाब के छींटों से नहीं बचता था, और दूसरा लोगों के दरमियान चुग़ली खा कर उन्हें एक दूसरे से लड़ाता था। फिर आपने खजूर की एक हरी शाख़ लेकर उसे चीरा, एक टुकड़ा हर क़बर पर गाड़ा, और फ़रमाया कि शायद जब तक ये सूखें नहीं इनके अज़ाब में कुछ तख़फ़ीफ़ रहे।

यह मुख़्तसर मंज़र हदीस के ज़ख़ीरे की एक वसीअ और निहायत जानदार तालीम का दरवाज़ा खोलता है: अज़ाब-ए-क़बर, "क़बर का अज़ाब।" इसमें मुर्दों से फ़रिश्ते सवाल करते हैं, ज़मीन उन्हें इस ज़ोर से भींचती है कि पसलियाँ एक दूसरे में पैवस्त हो जाती हैं, और हर सुबह-ओ-शाम उन्हें जन्नत या जहन्नम में उनका ठिकाना दिखाया जाता है — जबकि ख़ुद ज़िंदा नबी (सल्ल.) को अपनी दुआओं में इसी अंजाम से पनाह माँगते हुए दिखाया जाता है। इसके पहलू में एक ख़ामोश हक़ीक़त खड़ी है जो सदियों से बाज़ क़ारईन को बेचैन करती रही है: क़ुरआन, जो क़यामत के दिन का ज़िक्र बार-बार करता है, लफ़्ज़ "अज़ाब-ए-क़बर" कभी इस्तेमाल नहीं करता और इसकी सरीह तफ़्सील बहुत कम बयान करता है। यह मज़मून इन रिवायात और इस कशमकश को एक साथ रख कर सामने लाता है।

Continue Reading

Continue reading this article

Sign in free to read in full. Become a member to join the discussion without limits.

Sign in free to read →
Reader$0/mo
  • Read every article
  • Comment and reply (up to 100 words, 10/month)
  • Browse the community
  • Reader badge
Join as Reader
Scholar$8/mo
  • Everything in Writer
  • Scholar badge
  • Featured in the community
Join as Scholar