John Shaqi

"जहन्नम वालों की अक्सरियत औरतें हैं": बुख़ारी 304 के अल्फ़ाज़, ईद का मौक़ा और "नाक़िसात-ए-अक़्ल-ओ-दीन" की दलील

ईद की सुबह मदीने की औरतों से कहा गया एक वाक्य चौदह सदियों बाद भी बहस में है। बुख़ारी 304 का पूरा पाठ, मौक़ा, उससे जुड़ी दलील और विवाद के दोनों स्तंभ — ज्यों के त्यों पेश। फ़ैसला आपका है।

By John Shaqi · July 23, 2026 · 15 min read

"जहन्नम वालों की अक्सरियत औरतें हैं": बुख़ारी 304 के अल्फ़ाज़, ईद का मौक़ा और "नाक़िसात-ए-अक़्ल-ओ-दीन" की दलील

ईद की सुबह और एक वाक्य जो आज तक बहस में है

मदीना में ईद की सुबह है — ईद-उल-अज़हा या ईद-उल-फ़ित्र; ख़ुद रावी को यक़ीन नहीं कि कौन सी। पैग़म्बर-ए-इस्लाम ईदगाह की ओर निकलते हैं, औरतों की क़तारों के पास से गुज़रते हैं, उन्हें सदक़े (दान) की ताकीद करते हैं, और फिर एक ऐसा वाक्य कहते हैं जो चौदह सदियों से नक़ल, बचाव, आपत्ति और व्याख्या का विषय है: "मुझे दिखाया गया कि जहन्नम वालों की अक्सरियत तुम हो।"

मौजूद औरतें चुप नहीं रहीं। उन्होंने पूछा: क्यों? और जब जवाब में "नाक़िसात-ए-अक़्ल-ओ-दीन" (अक़्ल और दीन में कम) के शब्द आए तो उन्होंने फिर पूछा: कौन सी कमी? यह पूरा संवाद सहीह बुख़ारी की हदीस 304 में सुरक्षित है — जो आज इंटरनेट पर सबसे ज़्यादा विवादित हदीसों में से है।

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