John Shaqi

रस्म-ए-उस्मानी की बे-क़ायदगियाँ: जब एक ही शब्द दो तरह लिखा जाए

रस्म-ए-उस्मानी एक ही शब्द को दो तरह लिखता है — العلمين बिना अलिफ़, الصلوة वाव के साथ, رحمت खुली त के साथ। हम दर्ज वर्तनियाँ और शास्त्रीय इल्म-ए-रस्म साथ-साथ रखते हैं।

By John Shaqi · July 21, 2026 · 15 min read

जब एक ही शब्द दो तरह लिखा जाए

कोई भी छपा हुआ क़ुरआन खोलिए और शब्दों के नंगे ढाँचे पर ग़ौर कीजिए — वे अक्षर जिनसे बिंदु और स्वर-चिह्न हटा दिए जाएँ। इसी बुनियादी ढाँचे को रस्म (رسم) कहते हैं, यानी पाठ की "रेखा"। यह वह परत है जो उस समय तय हुई जब तीसरे ख़लीफ़ा उस्मान बिन अफ़्फ़ान ने लगभग 650 ईस्वी में लिखे हुए मसाहिफ़ को मानक बनाकर नई सल्तनत के बड़े शहरों की ओर भेजा।

अब एक ऐसी बात पर ग़ौर कीजिए जो हज़ार साल से अधिक समय से दर्ज है: एक ही शब्द हमेशा एक ही तरह नहीं लिखा जाता। एक आयत में किसी शब्द के साथ अलिफ़ होता है; दूसरी में वही शब्द अलिफ़ गिरा देता है। "नमाज़" शब्द वहाँ वाव के साथ लिखा जाता है जहाँ ध्वनि लंबी की है। स्त्रीलिंग का चिह्न कभी "खुली" के साथ आता है और कभी "बँधी" हुई — एक ही शब्द में, अलग-अलग स्थानों पर।

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