"लोगों से लड़ने का हुक्म" — बुख़ारी 25 का दायरा: पूरी इंसानियत, अरब के मुशरिक या हमलावर?
सहीह बुख़ारी की हदीस 25 कहती है: "मुझे हुक्म दिया गया है कि लोगों से क़िताल करूँ..." — मगर "लोग" कौन? पूरी इंसानियत, सिर्फ़ अरब के मुशरिक, या सिर्फ़ हमलावर? तीनों पाठों के असल ग्रंथ, टीकाकारों के कथन और अमली इतिहास — सब जस के तस। फ़ैसला आपका।
By John Shaqi · July 22, 2026 · 15 min read

एक शब्द, अर्थ की तीन दुनियाएँ
सहीह बुख़ारी की पहली किताब, किताब-उल-ईमान खोलिए। हदीस नंबर 25। अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि.) की रिवायत किया हुआ एक छोटा-सा वाक्य, जो यूँ शुरू होता है: "मुझे हुक्म दिया गया है कि लोगों से क़िताल (लड़ाई) करूँ..." चौदह सदियों से फ़क़ीह, ख़लीफ़ा, टीकाकार और आलोचक इस वाक्य के एक शब्द पर रुक जाते हैं: "अन-नास" — "लोग"। कौन से लोग? पूरी इंसानियत, जब तक ईमान न ले आए? एक सदी और एक प्रायद्वीप के अरब मुशरिक? या सिर्फ़ वे जिन्होंने पहले तलवार उठाई? एक जवाब पर सेनाएँ चली हैं, दूसरे जवाब पर संधियाँ लिखी गई हैं। यह लेख तीनों पाठों पर किताबें खोलता है।
यह लेख किसी धर्म का मज़ाक़ नहीं उड़ाता। हम वही करेंगे जो हमेशा करते हैं: किताबें खोलेंगे, ग्रंथों को जस का तस पेश करेंगे, और तीन सवाल पूछेंगे — वाक्य ख़ुद क्या कहता है? विद्वानों ने इसका दायरा क्या बताया? और इतिहास में अमल में क्या हुआ? कठिनाई भी और पारंपरिक जवाब व समाधान भी — दोनों पक्ष जस के तस नक़ल होंगे। फ़ैसला, हमेशा की तरह, आपका है।
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